Wednesday, February 24, 2010

कुछ नहीं,बस एक प्यार भरा साथ चाहिए मुझे

गहराते जाए वक़्त के साथ जो एक ऐसे रंग का कतरा चाहिए मुझे
बूँद बूँद में टपके प्यार जहाँ, ऐसे एहसास का दरिया चाहिए मुझे
और कुछ नहीं, एक साथ, बस एक प्यार भरा साथ चाहिए मुझे

अक्सर डगमगा जाते हैं ये कदम, कही-सुनी बातों से, कहीं कहीं ...
आंधी तूफ़ान हार जाए जहाँ, फौलादी विश्वास का वार चाहिए मुझे
और कुछ नहीं, एक साथ, बस एक प्यार भरा साथ चाहिए मुझे

मुझ में मेरा कुछ बाकी रहे, की तुझ में तेरा कुछ ...
ऐसा साफ़, अपने दरमियान, कुछ ऐसा पाक राज़ चाहिए मुझे
और कुछ नहीं, एक साथ, बस एक प्यार भरा साथ चाहिए मुझे

Friday, April 10, 2009

शमा ...

सारी रोशनी कहीं ज़माने के अंधेरो में खोती जाती हैं...
इस शमा की लौ कभी बुझती......
कभी झिलमिलाती नज़र आती हैं...
कहीं कहीं से सर्द हवाओं के थपरे....
कभी कहीं से बेरहम आंधी...
इसके हौसलों से खेलती जाती हैं...
फिर भी ...
खुद को रोशन करने की आरजू में...
तनहा हर रंग में बेखौफ्फ़ जलती जाती हैं....

Saturday, March 21, 2009

डरते नहीं डूबने से जो...........


डरते नहीं डूबने से जो...
ज़िन्दगी के असली मोती वही पाते हैं...
की गहरे गए ही नहीं जो कभी......
वो तो बस शीशों से ही दिल बहलाते हैं...

लगता है बहुत खूबसूरत जो....
वो समंदर नीला है क्या...
कौन जाने इस एक रंग में...
और कितने रंग समाते हैं...

झूठ कहते हैं वो कहते हैं जो...
ज़ज्बात किसी काम के नहीं होते....
की हम तो बस वही लिख पाते हैं...
जो ये हमसे लिखवाते हैं...

Tuesday, March 17, 2009

बढ़ना .......

कहते हैं आगे बढ़ने के लिए पिछली ज़मीन को त्यागना पड़ता हैं.....अरे कोई ये तो बताये...क्या पौधे का बढ़ना बढ़ना नहीं...जो अपनी ज़मीन से कभी जुदा होता नहीं.......लाख आंधी आये....लाख हौसले डगमगाए....टूट जाता है....पर छूटता नहीं...अपनी ज़मीन से कभी दगा करता नहीं....

Thursday, March 12, 2009

उम्मीद....

उम्मीद मुझसे, न कभी, कोई रखना,
करीब आना यूँ, की दिल को दूर रखना,

हो गया हूँ मैं, अब किसी चेहरे का,
कहता हूँ, मुझसे न कोई गिला रखना,

भूल कर बैठा था, मैं कुछ बेहोशी में,
हादसे से उस, दिल में न कोई हसरत रखना,

खामोशी से कह दीया, मैंने जो कुछ भी,
वही, हर सवाल के अपने, मेरा जवाब रखना,

अलविदा, सलाम आखिरी सब कर चूका मैं,
मुलाक़ात का, अब इससे आगे, न कोई ख्याल रखना.

Tuesday, March 10, 2009

ये क्या है जो सुलगता है ..


ये क्या है जो सुलगता है अन्दर कहीं....
उठता हैं धुआं तो बरसता हैं समंदर कहीं...

कुछ ऐसे तोड़ चला है हमसे रिश्ता कोई,
बहने लगा यादों से भी कतरा कतरा कहीं.....

फिर कोई मनचली हवा बहने लगी है कहीं...
फिर वहीँ दिल होने लगा है तबाह कहीं....

Wednesday, March 4, 2009

शराब की तुझे, मुझे तेरी


शराब की तुझे, मुझे तेरी,
दोनों को बीमारी, नशे की,
कुछ तो बात है इसमें, की
यूहीं तो पग लाये नहीं.

किससे कहें और किससे नहीं,
समझेगा कौन ये बात की,
नशे का शौक़ नहीं हैं कोई,
लग गयी है ये लत बुरी,
शराब की तुझे, मुझे तेरी

डर है तुझे, मुझे भी,
इसके छुट जाने का ही,
हो चाहे कोई बीमारी ही,
लगने लगी है ज़रूरत सी,
शराब की तुझे, मुझे तेरी