Monday, January 5, 2009

चल कभी बैठ साथ, पी लें अपने अपने ग़म


ताजुब होता है कभी, हंसी कभी आती है मुझे,
एक चेहरे में कितनी सूरतें नज़र आती हैं मुझे,

आज की शाम लगता हैं ऐसे नहीं गुजरेगी मुझसे,
दूर तलक कोई भी सूरत तो नज़र नहीं आती है मुझे,

इतनी बेबसी, इतनी लाचारी, ऐसे तो नहीं जीना है मुझे,
कभी कभी तेरी बोतल की खाविश भी आती है मुझे,

चल कभी बैठ साथ, पी लें अपने अपने ग़म,
बताऊँ तुझे, ये फिक्रें कैसे डसने आती हैं मुझे!

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