Saturday, January 17, 2009
रात रहते आया था वो..............
रात रहते आया था वो.......
अँधेरी गलियों को रोशन कर गया....
भटक रहे थे जो हौसले तनहा कहीं,
उनको खुशियों के रहगुज़र कर गया...
कैसा चाँद था वो भी, एक रात का
जाने कहाँ कहाँ, चांदनी बिखेर गया...
रात रहते आया था वो........
बेरंग दामन, सुबह के रंग कर गया...
फिर उड़ चला वो किसी तलाश में कहीं,
उस घयाल पंछी में कोई जान भर गया...
कैसा झोंका था वो भी एक वक़्त का,
क्या क्या ले गया, क्या क्या छोड़ गया ....
रात रहते आया था वो....
नर्म मुलायम रेत पर गीली सी छाप छोड़ गया ...
जिन आँखों में घुल गए थे कितने ही समंदर दर्द के,
उन आँखों में डूब कर कहीं कोई मुझे पार कर गया...
कैसा सैलाब था वो भी एक प्यार का,
ख्यालों के पिंजरे हकीक़त की लहरों से बिखेर गया.....
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