Monday, January 5, 2009
क्या पता..........
क्या पता, आज़मा रही है, या ज़िन्दगी कुछ सिखा रही है,
वक़्त की सुईओं में कौन जाने,ये कहाँ से कहाँ जा रही है,
एक ही बूँद मांगी थी मैंने तो, ये जी खोल बरसा रही है,
सुखी ज़मीं पे नयी फसल भी कोई, हवा संग लहरा रही है,
किसी नए नाम के परदे में कहीं, अपनी सी परछाई कोई नज़र आ रही है,
सहमी हुई सी, शरमाई हुई सी वो, लगता है बाहर आने से घबरा रही है,
ये आएना भी कहीं उनकी ज़बान बोलना सीख तो नहीं गया न,
कहीं कुछ मासूमियत मुझमे बाकी, इसे भी नज़र आ रही है.
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