सारी रोशनी कहीं ज़माने के अंधेरो में खोती जाती हैं...
इस शमा की लौ कभी बुझती......
कभी झिलमिलाती नज़र आती हैं...
कहीं कहीं से सर्द हवाओं के थपरे....
कभी कहीं से बेरहम आंधी...
इसके हौसलों से खेलती जाती हैं...
फिर भी ...
खुद को रोशन करने की आरजू में...
तनहा हर रंग में बेखौफ्फ़ जलती जाती हैं....
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umda hai .
ReplyDeleteएक अनुसरण कर्ता के ब्लॉग से आपके ब्लॉग तक पहुँची , आपने बहुत ईमानदारी से लिखा है , बढ़िया लिखा , वही लिखते हैं हम , जो जज्बात हमसे लिखवाते हैं |
ReplyDeleteइस शमा की लौ कभी बुझती......
कभी झिलमिलाती नज़र आती हैं...
कहीं कहीं से सर्द हवाओं के थपरे....
कभी कहीं से बेरहम आंधी...
इसके हौसलों से खेलती जाती हैं...
फिर भी
...वाह