Friday, April 10, 2009

शमा ...

सारी रोशनी कहीं ज़माने के अंधेरो में खोती जाती हैं...
इस शमा की लौ कभी बुझती......
कभी झिलमिलाती नज़र आती हैं...
कहीं कहीं से सर्द हवाओं के थपरे....
कभी कहीं से बेरहम आंधी...
इसके हौसलों से खेलती जाती हैं...
फिर भी ...
खुद को रोशन करने की आरजू में...
तनहा हर रंग में बेखौफ्फ़ जलती जाती हैं....

2 comments:

  1. एक अनुसरण कर्ता के ब्लॉग से आपके ब्लॉग तक पहुँची , आपने बहुत ईमानदारी से लिखा है , बढ़िया लिखा , वही लिखते हैं हम , जो जज्बात हमसे लिखवाते हैं |
    इस शमा की लौ कभी बुझती......
    कभी झिलमिलाती नज़र आती हैं...
    कहीं कहीं से सर्द हवाओं के थपरे....
    कभी कहीं से बेरहम आंधी...
    इसके हौसलों से खेलती जाती हैं...
    फिर भी
    ...वाह

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